Nauhas for Muharram and all Wafaats
Maatams for Muharram and all Wafaats
Nauhas
   
  आठ महोर्रम
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है मख़सूस आठवीं माहे अज़ा की जिस दिलावर से
बड़ी उलफत थी उस जर्रार को सिब्ते पयम्बर से

तलाया फिर रहे थे शह शबे आशूर जब हर सू
तो कुलसूम उस घड़ी यह कह रही थीं उस दिलावर से

के भय्या सुबह को कुर्बानिये आले महोम्मद है
निसार औलादे अपनी सब करेंगे शाहेदीं पर से

नहीं है कोई भी फ़रज़न्द मुझ दुखिया की दुनिया में
हिजाब आएगा कल के दिन मुझे सिब्ते पयम्बर से

सुनी जब यास की तक़रीर यह अब्बासे गाज़ी ने
तो रखकर सर को कदमों पर कहा कुलसूमे मुज़तर से

हूँ मैं भी तो गुलाम एक आपका क्यों आप को ग़म है
मुझे कल आप सदके़ कीजिएगा शाहेदीं पर से

ग़रज़ हमशीर को तस्कीन देकर चुप हुए मौला
ख़िताब अब मैं यह करता हूँ अलमदारे दिलावर से

के एै आक़ा ख़बर लिल्लाह लीजिए रोज़े आशूरा
सितमगर ले गए चादर उसी कुलसूम के सर से

उसी घर में चले आए लई, लीजिए ख़बर मौला
के जारी रस्म पर्दे की हुयी थी आह जिस घर से

शक़ी आबिद को लेकर अब चले हैं जानिबे कूफा
उठेगा बार क्योंकर तौक़ का बीमारो लाग़र से

बुलालीजिए सुए कर्बोबला अब 'फिक्र' को मौला
के सदमे उठ नहीं सकते हैं उसके क़ल्बे मुज़तर से

 

Please Recite Fateha for Marhoom - Syed Wirasat Ali Rizvi ibne Syed Mustafa Hussain Rizvi.
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