Nauhas for Muharram and all Wafaats
Maatams for Muharram and all Wafaats
Nauhas
   
  शहादते हज़रते अब्बास - आठ महोर्रम
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यह बोले हज़रते अब्बास आके सरवर से
के सब्र हो नहीं सकता है अब इस अहक़र से

हैं बच्चे तश्ना दहानी से जाँ बलब मौला
सदाए आला तश आती है खेमों के दर से

जो इज़ने जंग नहीं लाने दीजिए पानी
के मेरी प्यारी सकीना न आब को तरसे

यह सुनके हज़रते शब्बीर ने झुकाया सर
समझ ली भाई की मर्ज़ी सुकेते सरवर से

उठा के मशको अलम और लेके एक नैज़ा
चला दिलेर रज़ा पाते ही बरादर से

भगाके फौज़े सितम और भरके नहर से मशक
सुए ख़याम फिरे लड़ते फौजें़ अकफ़र से

थी मशक दोश पर और दस्ते रास्त में नैज़ा
जो एक लईं ने किया उस पर वार खन्ज़र से

संभाला मशको अलम बायें हाथ से लेकिन
तमाम फौज की थी जंग एक दिलावर से

बिल आखिर उस पर भी तलवार एक शक़ी की पड़ी
लहू का बह गया दरिया तने मुताहर से

मगर थी क़ोशिशें अब्बास पानी बच जाए
के सुरखुरूँ हूँ पिलाकर मैं बिन्ते सरबर से

दबा के दाँतों में तस्मा, बढ़े थे आप अभी
के आके तीर पड़ा लशकरे सितमगर से

इधर तो मशक छिदी धार निकली पानी की
एक आह सर्द उधर निकली क़ल्बे मुज़तर से

कुछ और आगे बढ़े थे के सर पर गुर्ज़ पड़ा
खि़ताब करके कहा तब जरी ने सरवर से

के जान अपनी फिदा की गुलाम ने मौला
दुआ है सेर हूँ अब दीदे रूए अनवर से

सदा यह सुनके कमर थाम के चले हज़रत
यह कहते जाते थे रो-रो के शाह अकबर से

किधर से आयी निदा जल्द ले चलो बेटा
के मरते वक़्त गले मिल लूँ मैं बरादर से

गरज़ के पहुँचे तो ग़लतान थे खून में अब्बास
न देखी जाती थी हालत जरी की सरवर से

उठा के सर रखा ज़ानू पर और रोके कहा
अगर हो कोई तमन्ना कहो बरादर से

कहा यह हज़रते अब्बास ने कि एै आक़ा
था दिल मंे शौक़े ज़ियारत मगर मुकद्दर से

एक आँख तीर से ज़ख्मी औद दूसरी पर
जमा है खून निकल कर शिगाफ्ता सर से

अबा का दामन उठाकर वह खून शाहेदीं ने
छुड़ाया दश्त में रो-रो के दस्ते अतहर से

रुखे हुसैन को हसरत से देखकर एक बार
क़रीब अपने बुलाकर कहा यह अकबर से

मुझे यक़ीन है पसे क़त्ल फौजे कूफा ओ शाम
करेगी बेअदबी जिस्में शाहे सफदर से

सिपुर्द करके मेरी लाश इब्ने साद को तुम
मेरी तरफ से यह कह देना बानी ए शर से

ऐवज़ हुसैन की पामाल कर दे लाश मेरी
के रोज़े हशर खिजालत न हो पयम्बर से

खि़ताब शह से किया फिर के मेरे लाशे को
हुजूर उठाएँ न लिल्लाह इस जगह पर से

किया था वादा सकीना से पानी लाने का
हूँ शर्मसार मैं आक़ा की प्यारी दुख़तर से

यह कहते-कहते सिधारे सूए, जिना अब्बास
हुसैन रोए लिपटकर तने बरादर से

दुआ करो बस अब एै 'फिक्र' तुम के या अब्बास
करीब क़ब्र मिले रौज़ए मुनव्वर से

 

Please Recite Fateha for Marhoom - Syed Wirasat Ali Rizvi ibne Syed Mustafa Hussain Rizvi.
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